युग फिर वो आ रहा है
बुरा दौर चला आ रहा है
समेट रहा है आदमी अपना दामन
मजबूर कर रहे है कुछ रावन
चल रही है फिर वो हेराफेरी
तेयारी है फिर छाने को रात अंधेरी
अपनी जड़े उखाड कर
दूसरों को संवारकर
दौड़ रहे है अन्धो की दौड़ में
त्राही-त्राही है देश
बद रहा है अपनों में द्वेष
थाम रही हैं परायों का दामन
जला रहे हैं घर का सावन
बेठे हैं मौत के मुंह में
पाप है सबकी रूह में
छोढ़ रहे अपनों का साथ
तुम कब जागोगे, विश्व के नाथ
घर का आँगन हो रहा सूनसान है
दिल भी अपना बेईमान है
हंस रहे है बाहर वाले
रो रहे है घर वाले
माँ अपनी है बेदम
आंसू पोंछने वाले है कम
रो रहा हिमालय है
बदनाम हो रहा विदयालया है
चुन रहे है बर्बादी का पथ
देश है अंध हथ
सुक रहा देश का नर है
ठग रहा संत फ़कीर है
बिक रहे आज फिर ईमान
फिर हरे हो रहे पुरानी निशान
खलिहान हो रहे वीरान
जल रहे है शमशान
दुश्मन दे रहा है फूँक
पेड़ रहे है सूख
जन है चुपचाप
ढल रहा है आफताब
जंगल का रजा हैरान है
पीछे पड़ा शैतान है
सब है आज आहत
अब तो जागो
मेरे प्रिय ,मेरे शौर्य , मेरे ईमान
मेरे देश आर्यव्रत (भारत)
- अद्दम्या
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